भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में योग और मोक्ष की प्राप्ति के लिए विभिन्न मार्गो का वर्णन किया है और कर्म से कर्मशून्यता का मार्ग भी बताया है जिनका अनुसरण कर मनुष्य कर्मबंधन से भलीभांति मुक्त हो जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त कर सकता है।
श्रीकृष्ण कहते है:
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।। (१०•१०)
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।। ( १०•११)
अर्थात: निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। हे अर्जुन ! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिये उनके अन्तःकरणमें स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ।
अगर हम हम सृष्टी को देखे तो बाहर और अन्दर(अन्तर मन में) में सभी चीजों का निर्माण (सृजन) मनुष्य मन के द्वारा ही हुआ है। हम जो सोचते है वैसे ही बन जाते है और उसी वस्तु का सृजन बाहर और अन्दर करते जाते है। एअर कंडीशनर, पंखा मोबाइल इत्यादि सभी चीजों का सृजन बाहरी जगत में मनुष्य मन की ही देन है। इसप्रकार मनुष्य का चरित्र भी मनुष्य के मन में चल रहे असंख्य विचारों के द्वारा ही सृजित हुए है।
जब मनुष्य निरन्तर परमात्मा में ध्यान लगाये प्रेमपूर्वक तत्त्वज्ञानरूपयोग को प्राप्त होता है तो मनुष्य के अन्तःकरण में स्थित अहंकार का नाश हो जाता है। अहंकार कुछ और नही अपितु मनुष्य द्वारा बाहरी जगत के लिए विचारों की वह श्रृंखला है जिसके द्वारा वाहरी जगत में सृजन होने पर हम उन चीजों का आन्नद लेते है जो क्षण भंगुर है। जब परमात्मा में लगे सतत् मन द्वारा अहंकार नष्ट होता है तो वही प्रलय है।
वाहरी जगत में प्राकृतिक आपदा ही आसकती है। वाह्य सृष्टी करोड़ो सालों से वही है प्राकृतिक आपदा आती है और चली जाती है।
पर जब अन्तरमन मे प्रलय आती है तो अंतर्नाद होता है (अंतरमन की आवाज सुनाइ पड़ती है)। और होता यह है जो शाश्वत है उसका साक्षात्कार होता है स्वयं का अनुभव होता है और स्वयं मन के द्वारा बनाई गई बाहरी जगत के लिए चलने वाले असंख्य विचारों की श्रृंखला का नाश हो जाता है। यही प्रलय है।
गुरू कृपा से
सौरभ वर्मा
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