भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में योग और मोक्ष की प्राप्ति के लिए विभिन्न मार्गो का वर्णन किया है और कर्म से कर्मशून्यता का मार्ग भी बताया है जिनका अनुसरण कर मनुष्य कर्मबंधन से भलीभांति मुक्त हो जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। श्रीकृष्ण कहते है: तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।। (१०•१०) तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।। ( १०•११) अर्थात: निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। हे अर्जुन ! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिये उनके अन्तःकरणमें स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ। अगर हम हम सृष्टी को देखे तो बाहर और अन्दर(अन्तर मन में) में सभी चीजों का निर्माण (सृजन) मनुष्य मन के द्वारा ही हुआ है। हम जो सोचते है वैसे ही बन जाते है और उसी वस्तु का सृजन बाहर और अन्दर करते जाते है। एअर कंडीशनर, पंखा मोबाइल इत...