भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है मेरी भक्ती में लगे मनुष्य के चार प्रकार के वर्ण है : 1. ब्राह्मण 2. क्षत्रिय 3. वैश्य 4. शूद्र शूद्र सबसे निम्न कोटि का साधक है जब भक्ति की शुरू की अवस्था में साधक ध्यान साधना या परमार्थ का प्रयास करता है तो उसके मन की चंचलता और साधक का शरीर साधक को स्थिर नही होने देती। और दस मिनट भी साधक अपने पक्ष में नहीं पाता। किन्तु साधक साधना में जरूर बैठता है। तब ऐसा साधक शूद्र वर्ण का कहा जाता है। वही साधक जब साधना करते - करते साधना के अगले चरण को प्राप्त होता है और साधक ध्यान की अवस्था में बहुत देर तक बैठ सकने में सक्षम हो जाता किन्तु साधक का मन अभी भी दुनियादारी में लगा रहता है। ऐसा साधक वैश्य वर्ण का कहलाता है। वही साधक जब और साधना करते - करते साधना के अगले चरण को प्राप्त होता है और साधक ध्यान की अवस्था में बहुत देर तक बैठ सकने के साथ-साथ मन को और मन से उत्पन्न होने बाले विकारों या विचारों को भलीभांति शांत कर लेता है। उस अवस्था में साधक क्षत्रिय वर्ण का कहलाता है।इस अवस्था में साधक का शरीर और मन शिकायतें करना बंद कर...